विश्व पृथ्वी दिवस पर ‘योगी’ राज की ये पेंटिंग बहुत कुछ कहती है …

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आगरा। एत्मादपुर के खंदौली रोड स्थित योगी राज क्लासेज एवं दिव्य योगा संस्थान के डायरेक्टर योगीराज धाकरे ने घर पर रह कर “विश्व पृथ्वी दिवस” को पेंटिंग बनाकर उसके महत्व को समझाया। और बताया की वर्ष की तरह इस वर्ष भी विश्वभर में 22 अप्रैल को पर्यावरण चेतना जाग्रत करने के लिये पृथ्वी दिवस मनाया गया। लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह महज औपचारिकता से ज़्यादा कुछ नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग के रूप में जो परिदृश्य आज हमारे सामने है,ऐसा लगातार बना रहा तो एक दिन ऐसा आएगा जब पृथ्वी से जीव−जंतुओं व वनस्पति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।


# क्यों मनाया जाता है पृथ्वी दिवस?
लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाने के उद्देश्य से पूरे विश्व में 22 अप्रैल, 1970 को पहली बार पृथ्वी दिवस का आयोजन किया गया था।
# बढ़ती जनसंख्या का दबाव-
वर्तमान समय में पृथ्वी के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती जनसंख्या है। पृथ्वी की कुल आबादी आज साढ़े सात अरब से अधिक हो चुकी है। यह प्रकृति का सिद्धांत है की आबादी का विस्फोट उपलब्ध संसाधनों पर नकारात्मक दबाव डालता है, जिससे पृथ्वी की नैसर्गिकता प्रभावित होती है। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पृथ्वी के दोहन (शोषण) की सीमा आज चरम पर पहुँच चुकी है। जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम-से-कम करना दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है।

# मनुष्य ही ज़िम्मेदार है-
पृथ्वी हमारे अस्तित्व का आधार है, जीवन का केंद्र है। यह आज जिस स्थिति में पहुँच गई है, उसे वहाँ पहुँचाने के लिये मनुष्य ही ज़िम्मेदार हैं। आज सबसे बड़ी समस्या मानव का बढ़ता उपभोग है, लेकिन पृथ्वी केवल उपभोग की वस्तु नहीं है। वह मानव जीवन के साथ-साथ असंख्य वनस्पतियों-जीव-जंतुओं की आश्रयस्थली भी है।
महात्मा गांधी का एक प्रसिद्ध कथन है… “हम दुनिया में जो भी बदलाव लाना चाहते हैं, उसे पहले हमें खुद पर लागू करना चाहिये।“ हमें आज यही करने की ज़रूरत है।
इस वर्ष की थीम ‘प्रजातियों को संरक्षित करें’
हमने डायनासोर, बड़े दांत वाले हाथी, गिद्ध जैसी प्रजातियों के बारे में किताबों में ही पढ़ा है, उन्हें कभी देखा नहीं। इस बात को लेकर विशेषज्ञ चिंतित हैं कि प्रकृति में हो रहे बदलाव के चलते मनुष्य की आने वाली पीढ़ियाँ तेज़ी से विलुप्ति के कगार पर खड़ी कई प्रजातियों के बारे में किताबों में पढ़कर न जाने। इसी को ध्यान में रखते हुए इस बार विश्व पृथ्वी दिवस की थीम “प्रजातियों को संरक्षित करें” रखी गई।
# कीट-पतंगे संकट में-
हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, मधुमक्खियाँ, चींटियाँ, गुबरैले (बीटल), मकड़ी, जुगनू जैसे कीट जो हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं, अन्य स्तनधारी जीवों, पक्षियों और सरीसृपों की तुलना में आठ गुना तेज़ी से विलुप्त हो रहे हैं।कीट-पतंगों का कम होना पारिस्थितिकी तंत्र के लिये घातक है, क्योंकि पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला के संतुलन के लिये कीट-पतंगों का होना बहुत ज़रूरी है।
जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, बढ़ते कंक्रीट के जंगल, शहरीकरण, अवैध शिकार और खेती-बाड़ी में कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल, समुद्र में व्याप्त प्लास्टिक प्रदूषण इन प्रजातियों के लुप्त होने के लिये ज़िम्मेदार हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने विलुप्त होने की कगार पर खड़े जीव-जंतुओं की जो सूची जारी की है, उसके अनुसार, 26,500 से अधिक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा है, जिनमें 40% उभयचर, 34% शंकुधारी, 33% कोरल रीफ, 25% स्तनधारी और 14% पक्षी हैं।
आज विश्व में हर जगह प्रकृति का दोहन जारी है जिससे विश्व स्तर पर लोगों की चिंता सामने आना शुरू हुई है। आज जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के लिये सबसे बड़ा संकट का कारण बन गया है। यदि पृथ्वी के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग जाएगा तो इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इस विश्व पृथ्वी दिवस पर संकल्प लेना चाहिये कि हम पृथ्वी और उसके पर्यावरण का संरक्षण करेंगे।

एत्मादपुर से पवन शर्मा की रिपोर्ट

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